मैसूर के राजमहल पर पाकिस्तान का झंडा: इतिहास का एक अज्ञात प्रकरण
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मैसूर के राजमहल पर पाकिस्तान का झंडा: इतिहास का एक अज्ञात प्रकरण

1946 की सामान्य परिस्थिति

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समूचा भारतवर्ष मोहम्मद अली जिन्ना द्वारा की गई अलग पाकिस्तान की मांग से उठे जहरीले धुएँ से उत्तेजित मुस्लिमों की उन्मादी सभाओं, भीड़ और छिटपुट हिंसा की कैद में था, चूँकि मुस्लिमों के मन में हिंदुओं के प्रति भय था l लाहौर से लेकर लखनऊ और कराची से कोलकाता तक, एक जैसे दृश्य थेl इसका मैसूर में फैलना भी स्वाभाविक था, जिसने आर्थिक समृद्धि के अपने उत्कृष्ट स्तर और शिक्षा के आधुनिक तीर्थ वाले आदर्श राज्य के रूप में एक ख्याति अर्जित कर ली थी l यह देशी रियासत अभी तक बहुत हद तक शांत थी l

यद्यपि हैदर अली और टीपू सुल्तान जोड़ी के अंतहीन धर्मांध शासन के कारण मैसूर रियासत में मुस्लिमों की एक बड़ी जनसंख्या भी थीl परिणामस्वरूप, जिन्ना के द्वारा जो विष फैलाया गया था, उसके लिए इच्छुक और प्रतीक्षारत श्रोता यहाँ पहले से तैयार थे l

जून 1946

इस समय तक मैसूर प्रतिनिधि सभा, बेंगलुरु जिला बोर्ड जैसे अनगिनत संस्थानों में अनेक मुस्लिम शक्तिशाली पदों पर आसीन हो चुके थे, जो जिन्ना के भड़काऊ भाषणों और पाकिस्तान की मांग तथा गांधी की घुटने टेकने वाली प्रतिक्रियाओं का वास्तविक मूल्यांकन करके अपना पूरा जोर जिन्ना के पीछे लगा चुके थे l इस मुस्लिम गुंडागर्दी के विरुद्ध, निर्भीक पत्रकार और संपादक टी. टी. शर्मा ने, जोकि उस दौर में कन्नड़ प्रेस के एक बड़े दिग्गज माने जाते थे, ‘विश्व कर्नाटक’ के पन्नों पर आग उगलती प्रतिक्रिया दी थी l जून 1946 में प्रचलित वातावरण पर उनके लेखन का एक प्रातिनिधिक नमूना निम्नलिखित है |

विधान-परिषद की कल की सभा में मुस्लिम लीग की मैसूर शाखा द्वारा ‘मैसूर पाकिस्तान’ का झंडा लहराने की आधारशिला रख दी गई है l

टी.टी. शर्मा का यह लेख मुस्लिम मैसूर लीग के सदस्य सैयद अब्दुल रहीम के इस सभा में दिए गए निम्न भाषण के उत्तर में था:

मैसूर के मुस्लिमों का प्रश्न अल्पसंख्यकों का प्रश्न नहीं है, वे कदापि अल्पसंख्यक नहीं है l वे एक अलग जातीय वंश है l

“स्वतंत्र” भारत के कई अज्ञानी और इतिहासबोध से रहित पत्रकारों और संपादकों से अलग टीटी शर्मा अपने इतिहास को जानते थे l उन्होंने लिखा,

किसी को इस भुलावे में नहीं रहना चाहिए कि ‘मैसूर पाकिस्तान’ की मांग नई है l या कि यह इस दिशा में उठाया गया पहला कदम है l हमारे पास हैदरअली खान की परंपरा है जिसने वाडियार को किनारे लगा दिया था, और उन्ही के पदचिन्हों पर चलते हुए उसके पुत्र टीपू सुल्तान ने संपूर्ण वाडियार राजपरिवार को बंदी बना लिया था... सांप्रदायिक निर्वाचन क्षेत्र की रचना होने के बाद हुई कुछ तात्कालिक घटनाओं को यहां पर सूचीबद्ध करना जरुरी है... मुस्लिम लीग की स्थापना का मूल उद्देश्य आधारभूत रूप से किस ओर संकेत करता है? बेंगलुरु में 1928 में फूटा गणपति दंगा l इस अवसर पर बेंगलुरु जिला बोर्ड के अध्यक्ष अब्दुल रहीम ने एक लघु-पुस्तिका लिखी थी, जिसमें ऐसे नगीने उपलब्ध थे: ‘मत भूलिए कि मुस्लिमों ने अतीत में मैसूर पर राज किया है’ और तो और जनता की प्रतिनिधि सभा के सदन में उसके सदस्य मिर्जा अजीजुल्लाह बेग ने सभी को धमकाते हुए कहा था, ‘यहाँ किसी को भी यह नहीं भूलना चाहिए कि अभी अभी बीते हुए भूतकाल में मैसूर मुस्लिमों द्वारा शासित था!’ मुस्लिमों के एक समूह द्वारा मंत्रियों के एक प्रतिनिधिमंडल को एक ‘मुस्लिम ज्ञापन’ दिया गया था. इस अवसर पर चन्नापट्टाना के एक मुस्लिम नेता ने कहा था, ‘हमारी प्रतिबद्धता मैसूर के महाराजा के प्रति नहीं है l वह भारत पर राज कर रहे ब्रिटिश साम्राज्य के प्रति है’ l

दो दशक पहले, धर्मांधता के लिए कुख्यात अली बंधुओं में से एक शौकतअली खिलाफत आंदोलन के समर्थन में श्रीरंगपट्टनम को भेंट दे ही चुके थे l अपने चरम उत्तेजनापूर्ण संबोधन में उन्होंने घोषणा की थी,

‘हम यहां श्रीरंगपट्टनम की पवित्र तीर्थयात्रा पर आए हुए हैं l इस तीर्थयात्रा में टीपू सुल्तान की पवित्र मजार को भेंट देना भी शामिल है l वे हमारे राष्ट्रीय नायक है l’

जब गणपति दंगे की यह घटना हुई थी, मिर्जा इस्माइल मैसूर के दीवान थे l इस घटना की जाँच को लटका दिया गया और जिस मुस्लिम भीड़ ने इसे भड़काया था, उसे निरपराध घोषित करके छोड़ दिया गया था l जब सार्वजनिक जीवन में कार्यरत एक प्रमुख व्यक्ति ने एक दूसरे मुस्लिम नेता से इस संदर्भ में यह पूछा कि इतना घोर अन्याय कैसे हुआ, तो जो उत्तर मिला, वह यह था: “मिर्जा साहब हमारा आदमी है”, इसमें कितनी वास्तविकता है, यह यहाँ महत्वपूर्ण नहीं है l बल्कि इस टिप्पणी के पीछे जो मस्तिष्क काम कर रहा था, वह उल्लेखनीय है l इसपर टिप्पणी करते हुए टी.टी. शर्मा ने लिखा था,

परसों के ‘अल्पसंख्यक’ कल के ‘शक्तिशाली अल्पसंख्यक’ बन चुके थे l आज वे एक अलग ‘जातीय वंश’ बन चुके हैं! मैसूर के मुस्लिमों के लिए जिन्ना की योजनाएं, कार्यक्रम और आयुध मुख्य प्रेरणा बन चुके हैं l

अपनी 26 जून 1946 की आवृति में दैनिक ‘देशबंधु’ समाचारपत्र ने निम्न समाचार प्रकाशित किया था:

मुस्लिम समुदाय के एक विशिष्ट प्रतिनिधि ने सरकार से मांग करते हुए एक ज्ञापन दिया है कि टीपू सुल्तान के वंशजों में से किसी एक को मैसूर राज्य की गद्दी पर बिठाया जाना चाहिए l चौकानेवाली यह घटना संकेत दे रही है कि हवा किस ओर बह रही है l यदि हम कोई सावधानी नहीं बरतते हैं, तो हमें निकट भविष्य में गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं l

टी.टी. शर्मा के ‘विश्व कर्नाटक’ की पुरानी आवृति में टीपू सुल्तान की तलवार पर किये उत्कीर्णन के बारें में एक संदर्भ दिया गया था l बेंगलुरु के जिला दंडाधिकारी ने, जोकि एक मुस्लिम था, तुरंत संपादक के नाम एक पत्र प्रेषित कर दिया:

‘आपने जिस शैली में लिखा है, उससे मुस्लिमों की अवमानना होती है l समूचा समुदाय इससे बेहद क्षुब्ध है l कृपया अपनी गलती सुधार लें l’

उसे लेख में गलती क्या थी? इसमें ‘टीपू सुल्तान’ का उल्लेख एकवचन में किया गया था l टी.टी. शर्मा ने मैसूर के मुस्लिम समुदाय की इस जन्मजात कट्टरता पर संकेत करते हुए तीखी टिप्पणी के साथ लिखा था:

पिछले 25 वर्षों में हमने वास्तविक जीवन में घटी घटनाओं के उदाहरण देते हुए मैसूर के मुस्लिम समुदाय की असली मानसिकता को निरतंर उजागर किया है l हमने उनकी ‘लीगी’ मानसिकता को बतानेवाले कई विवरण विस्तार से प्रस्तुत किये हैं l हमने उनकी देशभक्ति के असली रंग को उजागर कर दिया है l तथापि हमारी सरकार इस संदर्भ में निरंतर उन पर अंधा विश्वास करती आयी है और उन्हें पुचकारती रहती है l और तो और, कई कथित हिंदू नेता भी शोर करते रहते है कि ‘मैसूर के हिंदू और मुस्लिम भाई-भाई की तरह रहते है’ l इन सभी क्रियाओं का अंतिम परिणाम, सैयद अब्दुल रहीम की इस घोषणा में आया है कि मैसूर के मुस्लिम एक अलग जातीय वंश है l यह संपूर्णतः जिन्ना की ही प्रतिध्वनि है l अब केवल एक ही बात रह जाती है, वह है, मैसूर के राजमहल पर पाकिस्तान का झंडा लहराना l

उपसंहार

इतिहास से कुछ भी नहीं सीखने की अपनी बारंबारता और दुखद असफलता के चलते हिंदुओं ने इन चेतावनियों पर कोई ध्यान नहीं दिया l नतीजतन 16 अगस्त 1946 को मोहम्मद अली जिन्ना ने अपने बर्बर ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ की घोषणा कर दी l

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